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Pune | आख़िरकार बालसुधारगृह की पीडासे बच्चोंको मिला छुटकारा

Sajag Nagrikk Times:कात्रज यतीम खाना/मदरसा कांड में के बच्चों को आखीरकार राहत मिल ही गई। सिर्फ एक को छोड़कर बाकी सभी ३१ बच्चों की रवानगी अपने अपने घर बिहार को 28 की रात ९:५० मि. पर पुना-दानापुर एक्सप्रेस से हो गई। कुछ मिठि कुछ कडवी यादों के साथ बच्चों ने और उनके वालिदो ने पुना शहर और मदरसे को अलविदा कहा।

दरअसल पिछले महीने कात्रज यतीम खाना/मदरसा के दो बच्चे मदरसे से भाग निकले और पुना रेल्वे स्टेशन पर अपने गांव जाने पहोच गये। रेल्वे पोलीस बल को शक होने से पुछताछ करने पर पता चला के बच्चे मदरसे से भाग आये है। उन्होंने सामाजिक संस्था सारथी के हाथों बच्चों को सौंप दिया। उन्होंने बच्चों से बातचीत में विश्वास में लेकर भाग जाने की वजह पता की। तब उनके मुताबिक ऐसा पता चला के बच्चो के साथ एक उस्ताद गलत हरकत करता था ईसलिए हम भाग आये। 
तों फिर क्या हैं सब मिडिया, सभी NGO, सारी पोलीस फोर्स उस खबर के लिए तुट पडी। 
उस्ताद को हिरासत में लेकर बच्चों की मेडिकल के लिए ससुन Hospital में रवानगी कि गई। जों रात के २:०० बजे तक चलती रही।
मिडीया में यह खबरे चलती रही और वहां कानुनी कारवाई चलती रही।

लेकिन ईन सब के बीच बच्चे एक महीना बाल सुधार गृह शिवाजी नगर में थे। जहां बच्चों को एक हॉल में प्लास्टिक के पेपर पर सोना पडता था।और बहोत सारे बच्चों को खुजली की बिमारी हुई। जिसमे एक बच्चे को उसकी दवा देने से घबराहट पैदा हो गई। ईसलिए उसे ससुन Hospital में ऐडमिट किया गया .बाद में जहां यह भी पता चला के, किडनी पर सुजन भी आई है। इसलिए वह अब भी ससुन Hospital में ही है। उसी तरहां एक तलबा का सर फटा हुआ था। ईस दौरान बच्चों के मां-बाप अपने अपने बच्चों को घर ले जाने के लिए पुना शहर आकर पिछले २०-२५ दिन से कोशिश कर रहे थे। लेकिन कोई उनकी दखलअंदाजी नहीं ले रहा था। यहां तक के उन्हे अपने जिगर से मिलने तक नहीं गया। सिर्फ एक बार पाच मिनट के लिए जल्दबाजी में मुलाकात कराई गई ऐेसी जानकारी मिली  ।
ईन सभी बातों का खबर जब पुना के जिम्मेदारों को और तजींमो को  लगी और शक होने लगा तों सब ने खंदे से खदां लगाकर ईस ईश्शु को हाथ में लिया। बच्चों के मा बाप का खाने का रहेने का ईन्तेजाम कर के सिर्फ दो दिन में बच्चों को अपने अपने घर रवाना कर दिया।
जहां प्रशासन में पोलीस महकमेने FIR तक नहीं ली। वही जिल्हाअधिकारी  नवलकुमार राम ईन्होने सभी जिम्मेदार और बच्चों के मा बाप की बातें सुनी चंद वक्त रुकाकर सभी महकमों को तलब करके कुछ ही घंटों में बच्चों को छुड़वाया।

 सिर्फ बच्चों को छोड़ा ही नहीं तों उनके घरवालों की भी टिकट देकर बच्चो के साथ ही पुरी सुरक्षा के साथ अपना फोन नंबर घरवालों को देकर रवानगी की।पुना के सभी जिम्मेदारों ने भी पुना रेल्वे स्टेशन पर जाकर बच्चों की रवानगी की साथ में खाने का सामान दिया गया। एक भाई ने हर एक बच्चे को २००/-₹ हाथ में दिया।

लेकिन एक सवाल यु का यु ही रहे गया के, बच्चों का कसुर क्या था ? जों के, एक महीना बच्चें सुधार गृह में थे।
जहां भारती विद्यापीठ के पोलिस स्टेशन ने जांच पुरी हो गई है आप बच्चों को छोड सकते हैं ऐसा लेटर भी दिया था।
बच्चो से मिलने क्यु नहीं दिया जा रहा था ?
बच्चो को Injury क्यु हो रही थी ? जिम्मेदारों को रात के २:३० बजे तक रुकाकर भी FIR क्यु नहीं ली गई ?
कई सवाल है जिसके जवाब मिलना बाकी है। 
लेकिन, वह वक्त आ गया अवाम को सोचने का के, क्या मदरसा कोई भी खोल सकता है ?
क्या मदरसे कैसे होने चाहिए ?
क्या किसी इलाके में, जिल्हे में, राज्य में मदरसों की तादाद कितनी होनी चाहिए ?
क्या मदरसो को दिया हुआं चंदा सही इस्तेमाल हो रहा है ?
क्या मदरसो के नाम पर किसीने दुकान खोली है ?

क्या मदरसों का हिसाब किताब होता है ?
क्या मदरसे किसी की जाती सस्थां होती है या कोई रजिस्टर ट्रस्ट ?
क्या बच्चों का कुछ रेकॉर्ड देते हैं कितने हाफ़िज़ आलिम मुफ्ति बने और कितने बीच में ही छोड़ गये ?
ईन सभी बातों को भी अवाम को गहराई से सोचना होगा।
आसपास के मदरसों को वक्त रहते Visit देते रहेना चाहिए।
किसी भी मस्जिद में चदे को आये हुऐ सफिरो की पुरी तहेकीक  करनी चाहिए।
और सबसे बड़ी बात जों भी नया मदरसा खोल रहा होगा तों दस बार सोचों उस इलाके में कितने मदरसे है ?
क्या ईस फिर से बनने वाले मदरसे की जरुरत है करता ?
क्या ईस बनने वाले मदरसे में बच्चे कहां से लानेवाले हैं ?
मकामी-जिल्हे के-राज्य के बच्चों को ईसकी जरुरत है क्या ?
 ऐसे कई  सवाल  सामाजिक कार्यकर्ता  गौस शेख ने खड़े किये,

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